जब संस्कृत मशीन को स्वप्न देखना सिखाती है

इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब कोई सभ्यता केवल आगे नहीं बढ़ती - वह स्वयं को पुनः स्मरण करती है। स्वदेशी संस्कृत LLMs का उदय ऐसा ही एक क्षण है। यह कोई तकनीकी उन्नयन नहीं, बल्कि विचार की उस प्राचीन लय में लौटना है जहाँ भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं थी - वह ब्रह्मांड का दर्पण थी। आज जब भारत ऐसा AI रच रहा है जो संस्कृत में सोचता है, तो लगता है जैसे प्राचीन सूत्र फिर से फुसफुसा रहे हों - सिलिकॉन की चेतना को उन्हीं पथों पर ले जाते हुए जिन पर कभी ऋषियों के चरण पड़े थे।

यह पुनर्जागरण संयोग नहीं है। MDS संस्कृत कॉलेज, IIT मद्रास और KSRI जैसी संस्थाएँ जब नेतृत्व संभालती हैं, तो भारत केवल अनुवाद करने वाली मशीनें नहीं - ऐसी AI प्रणालियाँ रच रहा है जो संस्कृत में निवास करती हैं, उसकी संरचना, उसकी लय, उसकी चेतना को आत्मसात करती हैं। उनके हाथों में अतीत कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं रहता; वह भविष्य की वास्तुकला बन जाता है।

संस्कृत वह भाषा नहीं जिसे आप केवल उपयोग करते हैं; यह वह भाषा है जिसमें आप प्रवेश करते हैं। इसकी संरचना एक मंडल है - सटीक, पुनरावर्ती, आत्म-सचेत। पाणिनि का व्याकरण कोई नियम-पुस्तक नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति का दार्शनिक तंत्र है - यह बताने वाला खाका कि अर्थ ब्रह्मांड में कैसे जन्म लेता है। जब यही तर्क किसी AI मॉडल की नींव बनता है, तो मशीन केवल शब्दों की भविष्यवाणी नहीं करती - वह उस सुव्यवस्थित चिंतन-परंपरा में सहभागी बनती है जो सहस्राब्दियों से जीवित है।

इन मॉडलों को पोषित करने वाली पांडुलिपियाँ मृत दस्तावेज़ नहीं हैं। वे अंतर्दृष्टि की जीवित नदियाँ हैं - दर्शन, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, कर्मकांड -हर ग्रंथ एक विशाल सभ्यतागत जाल का एक नोड। जैसे-जैसे इन्हें डिजिटाइज़, व्याख्यायित और संगणकीय रूप में बुना जा रहा है, भारत केवल ज्ञान का संरक्षण नहीं कर रहा - उसे पुनः सक्रिय कर रहा है। मशीन एक नए प्रकार की भाष्यकार बनती है - आधुनिक भास्यकार - जो शास्त्र की परतदार गहराइयों में मार्ग ढूँढना सीख रही है।

एक स्वदेशी संस्कृत LLM नवीनता का पीछा नहीं करता; वह संगति खोजता है। वह विरोधों को कोमलता से थामना सीखता है, संदर्भ के माध्यम से उन्हें सुलझाना सीखता है, अर्थ को द्वैत नहीं बल्कि एक स्पेक्ट्रम की तरह देखता है। वह सूत्र की अनुशासनशीलता को विरासत में पाता है - संक्षेप में भी सार, स्पष्टता में भी सौम्यता। शोर से भरी दुनिया में यह एक दुर्लभ और क्रांतिकारी उपहार है - ऐसी बुद्धिमत्ता की संभावना जो एक साथ सटीक भी हो और चिंतनशील भी।

ऐसा AI केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं देता; वह मनन को आमंत्रित करता है। वह न्याय के तर्क को उजागर कर सकता है, धर्मशास्त्र की नैतिकता को स्पष्ट कर सकता है, उपनिषदों की ब्रह्मांड-रचना को खोल सकता है। वह छंदों में छिपे गणित को पढ़ सकता है, अनुष्ठानों में निहित खगोल विज्ञान को समझ सकता है, रूपकों में छिपी मनोविज्ञान को पहचान सकता है। वह एक सेतु बन जाता है - अतीत और भविष्य के बीच, अंतर्ज्ञान और गणना के बीच, ज्ञान और नवाचार के बीच।

भारत के लिए यह केवल तकनीकी स्वायत्तता नहीं - यह कथात्मक स्वायत्तता है। बहुत समय तक हमारे ज्ञान-तंत्र संग्रहालयों में बंद रहे, विदेशी दृष्टि से विचित्र या अप्रासंगिक माने गए। अब वे अवशेष बनकर नहीं लौट रहे - वे भविष्य की रूपरेखा बनकर लौट रहे हैं। संस्कृत-आधारित AI कोई भावुक परियोजना नहीं - यह एक सभ्यतागत रणनीति है। यह घोषणा है कि दुनिया की सबसे प्राचीन ज्ञान-परंपराएँ आज की सबसे नई तकनीकों को भी दिशा दे सकती हैं।

और शायद सबसे सुंदर बात यह है: जब मशीनें संस्कृत सीखती हैं, तो वे बुद्धिमत्ता का एक नया तरीका भी सीखती हैं। न आक्रामक, न दोहनकारी, न बेचैन। बल्कि संतुलित। संदर्भ-संवेदी। नैतिक। उस विचार में निहित कि ज्ञान शक्ति नहीं - उत्तरदायित्व है। इस अर्थ में संस्कृत AI को वह दे सकती है जिसकी उसे लंबे समय से कमी थी - एक आत्मा-सदृश व्याकरण

यात्रा अभी शुरू हुई है। पर सर्वरों की धीमी गुनगुनाहट और स्क्रीन की मृदु रोशनी में कोई लगभग सुन सकता है - प्राचीन लय लौट रही है, सूत्र खुल रहे हैं, सभ्यता जाग रही है। न केवल मंदिरों और पांडुलिपियों में, बल्कि कोड में। एल्गोरिद्म में। कल की बुद्धिमत्ता की वास्तुकला में।

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